कहते हैं वो इन मुद्दों पर सवाल मत करो।
इन छोटी छोटी बातों का ख्याल मत करो॥
कोई नहीं है दूध का धुला हुआ यहाँ-
एक दूसरे के दाग़ पर बवाल मत करो॥
-विनय ओझा स्नेहिल
I hereby want to publish my Hindi and Urdu poems.This i s collection of my best compositions. Almost of same has been brodcasted on All India Radio.
कहते हैं वो इन मुद्दों पर सवाल मत करो।
इन छोटी छोटी बातों का ख्याल मत करो॥
कोई नहीं है दूध का धुला हुआ यहाँ-
एक दूसरे के दाग़ पर बवाल मत करो॥
-विनय ओझा स्नेहिल
क्या कहें कैसे कहें कुछ कहना भी दुश्वार है ।
सिर पे सच्चाई के अब लटकी हुई तलवार है ॥
सोंच में बैठा हुआ मांझी करे तो क्या करे?
बिक चुकी तूफ़ान के हाथों सभी पतवार है॥
जिन दियों से रोशनी मिलती नहीं वो फोड़ दो-
उन दियों को ताख पर रखना ही अब बेकार है॥
खौफ से इस घर का मलिक हो गया है बेदखल-
जिसका कब्जा है वो इक सरकश किराएदार है॥
दोस्तो स्नेहिल बिना बुनियाद कुछ कहता नहीं -
ग़र शहादत चाहते हो पेश यह अखबार है ॥
-विनय ओझा स्नेहिल
मुझे मालूम न था ऐसे भी दिन आएंगे।
रहनुमा राह्जनों के शिविर में लाएंगे ॥
बढ़ा के दोस्ती का हाथ वे हमारी तरफ -
हमारे दुश्मनों से हाथ भी मिलाएँगे॥
सियाह रात भी रोशन हो चाँदनी जैसी-
दिए हम आस के पलकों पे यूँ जलाएँगे॥
घर पे रह जाएगा मालिक भी हाथ मलता हुआ-
चमन के माली ही फल लूट के खा जाएँगे॥
फिर भी ये है गुमाँ चमन हरा भरा होगा-
शर्त ये है इसे अपना लहू पिलाएँगे॥
कि नाउम्मीदी की तपिश ने जिनको सोख लिया-
ख़ुशी के सपने उन आँखों मे झिल्मिलाएंगे ॥
मुझे मुश्किल मे देख कर जो खुश होते थे कभी-
मेरी खुशियों को देख कर वे तिल्मिलाएंगे ॥
-विनय ओझा 'स्नेहिल '
अब सुनाई ही नहीं देती है जनता की पुकार।
इस तरह छाया हुआ है उनपे गद्दी का खुमार ॥
अब दुकानों से उधारी दूर की एक बात है-
जब बगल वाले नहीं देते हैं अब हमको उधार ॥
लाँघ पाना या गिरा पाना जिसे मुमकिन नहीं -
हर दिलों के दरमियाँ नफरत की है ऊँची दिवार॥
सैकड़ों बगुलों ने मिल घेरा है एक दो हंसों को-
लगता नामुमकिन है लाना अब सियासत में सुधार॥
खुद की कुर्बानी का जज्बा गुम गया जाने कहाँ-
इस शहर में हर कोई है लूटने को अब तयार॥
-विनय ओझा 'स्नेहिल '
वक़्त भर देता है हर एक ज़ख्म की गहराईयाँ ।
फिर भी रह जाती हैं क्यों ये मातमी परछाइयाँ ॥
या खुदा एक पल में दिखता दो तरह ज़लवा तेरा-
एक तरफ मातम का डेरा एक तरफ शहनाइयाँ ॥
स्याह रातों से न जाने दिल क्यों घबराने लगा-
साँप सी डसती हैं मुझको शाम की तन्हाइयाँ ॥
दफन अश्कों ने किया ग़म के कई तूफान को -
दर्द भरती हैं नसों में मद भरी पुर्वाईयाँ ॥
जो सबेरे उठ गए मीलों सफर से आ चुके-
रह गए बिस्तर पे जो लेते रहे अन्गडाइयां॥
जिनको चुन कर भेजा अपनी रहनुमाई के लिए -
बैठ कर सदनों में वे लेते हैं अब जम्हाइयां ॥
विनय ओझा 'स्नेहिल'
ठोकरें राहों में मेरी कम नहीं।
भी देखो आँख मेरी नम नहीं।
जख्म वो क्या जख्म जिसका हो इलाज-
जख्म वो जिसका कोई मरहम नहीं।
भाप बन उड़ जाऊंगा तू ये न सोच-
मैं तो शोला हूँ कोई शबनम नहीं।
गम से क्यों कर है परीशाँ इस क़दर -
कौन सा दिल है कि जिसमें ग़म नहीं।
चंद लम्हों में सँवर जाए जो दुनिया -
ये तेरी जुल्फों का पेंचो-ख़म नहीं।
दाद के काबिल है स्नेहिल की गज़ल-
कौन सा मिसरा है जिसमें दम नहीं।
-विनय ओझा ' स्नेहिल'
ज़िन्दगी क्यों उदास लगती है ।
मौत जब आस- पास लगती है ॥
मुझसे वह बिन मिले नहीं जाता -
कुछ तो दिल में खटास लगती है॥
कितने अर्सों से देखता हूँ उसे -
फिर भी हर लम्हा ख़ास लगती है॥
जितनी कोशिश करो बुझाने की -
उतनी ही ज्यादा प्यास लगती है॥
मर के भी आंख थी खुली उसकी -
उनको मेरी तलाश लगती है ॥
- विनय ओझा "स्नेहिल "