Tuesday, April 8, 2008

कता

कहते हैं वो इन मुद्दों पर सवाल मत करो।
इन छोटी छोटी बातों का ख्याल मत करो॥

कोई नहीं है दूध का धुला हुआ यहाँ-
एक दूसरे के दाग़ पर बवाल मत करो॥

-विनय ओझा स्नेहिल

Thursday, March 27, 2008

क्या कहें ?कैसे कहें?

क्या कहें कैसे कहें कुछ कहना भी दुश्वार है ।
सिर पे सच्चाई के अब लटकी हुई तलवार है ॥

सोंच में बैठा हुआ मांझी करे तो क्या करे?
बिक चुकी तूफ़ान के हाथों सभी पतवार है॥

जिन दियों से रोशनी मिलती नहीं वो फोड़ दो-
उन दियों को ताख पर रखना ही अब बेकार है॥

खौफ से इस घर का मलिक हो गया है बेदखल-
जिसका कब्जा है वो इक सरकश किराएदार है॥

दोस्तो स्नेहिल बिना बुनियाद कुछ कहता नहीं -
ग़र शहादत चाहते हो पेश यह अखबार है ॥
-विनय ओझा स्नेहिल

Tuesday, February 19, 2008

कविता


मुझे मालूम न था ऐसे भी दिन आएंगे।

रहनुमा राह्जनों के शिविर में लाएंगे ॥

बढ़ा के दोस्ती का हाथ वे हमारी तरफ -

हमारे दुश्मनों से हाथ भी मिलाएँगे॥

सियाह रात भी रोशन हो चाँदनी जैसी-

दिए हम आस के पलकों पे यूँ जलाएँगे॥

घर पे रह जाएगा मालिक भी हाथ मलता हुआ-

चमन के माली ही फल लूट के खा जाएँगे॥

फिर भी ये है गुमाँ चमन हरा भरा होगा-

शर्त ये है इसे अपना लहू पिलाएँगे॥

कि नाउम्मीदी की तपिश ने जिनको सोख लिया-

ख़ुशी के सपने उन आँखों मे झिल्मिलाएंगे ॥

मुझे मुश्किल मे देख कर जो खुश होते थे कभी-

मेरी खुशियों को देख कर वे तिल्मिलाएंगे ॥

-विनय ओझा 'स्नेहिल '

Monday, January 7, 2008

ग़ज़ल

अब सुनाई ही नहीं देती है जनता की पुकार।
इस तरह छाया हुआ है उनपे गद्दी का खुमार ॥

अब दुकानों से उधारी दूर की एक बात है-
जब बगल वाले नहीं देते हैं अब हमको उधार ॥

लाँघ पाना या गिरा पाना जिसे मुमकिन नहीं -
हर दिलों के दरमियाँ नफरत की है ऊँची दिवार॥

सैकड़ों बगुलों ने मिल घेरा है एक दो हंसों को-
लगता नामुमकिन है लाना अब सियासत में सुधार॥

खुद की कुर्बानी का जज्बा गुम गया जाने कहाँ-
इस शहर में हर कोई है लूटने को अब तयार॥


-विनय ओझा 'स्नेहिल '

Monday, December 10, 2007

वक्त भर देता है ...

वक़्त भर देता है हर एक ज़ख्म की गहराईयाँ ।
फिर भी रह जाती हैं क्यों ये मातमी परछाइयाँ ॥

या खुदा एक पल में दिखता दो तरह ज़लवा तेरा-
एक तरफ मातम का डेरा एक तरफ शहनाइयाँ ॥

स्याह रातों से न जाने दिल क्यों घबराने लगा-
साँप सी डसती हैं मुझको शाम की तन्हाइयाँ ॥

दफन अश्कों ने किया ग़म के कई तूफान को -
दर्द भरती हैं नसों में मद भरी पुर्वाईयाँ ॥

जो सबेरे उठ गए मीलों सफर से आ चुके-
रह गए बिस्तर पे जो लेते रहे अन्गडाइयां॥

जिनको चुन कर भेजा अपनी रहनुमाई के लिए -
बैठ कर सदनों में वे लेते हैं अब जम्हाइयां ॥

विनय ओझा 'स्नेहिल'

Thursday, November 22, 2007

ठोकरें राहों में मेरी कम नहीं।
भी देखो आँख मेरी नम नहीं।

जख्म वो क्या जख्म जिसका हो इलाज-
जख्म वो जिसका कोई मरहम नहीं।

भाप बन उड़ जाऊंगा तू ये न सोच-
मैं तो शोला हूँ कोई शबनम नहीं।

गम से क्यों कर है परीशाँ इस क़दर -
कौन सा दिल है कि जिसमें ग़म नहीं।

चंद लम्हों में सँवर जाए जो दुनिया -
ये तेरी जुल्फों का पेंचो-ख़म नहीं।

दाद के काबिल है स्नेहिल की गज़ल-
कौन सा मिसरा है जिसमें दम नहीं।

-विनय ओझा ' स्नेहिल'

Friday, November 2, 2007

जिंदगी

ज़िन्दगी क्यों उदास लगती है ।
मौत जब आस- पास लगती है ॥

मुझसे वह बिन मिले नहीं जाता -
कुछ तो दिल में खटास लगती है॥

कितने अर्सों से देखता हूँ उसे -
फिर भी हर लम्हा ख़ास लगती है॥

जितनी कोशिश करो बुझाने की -
उतनी ही ज्यादा प्यास लगती है॥

मर के भी आंख थी खुली उसकी -
उनको मेरी तलाश लगती है ॥

- विनय ओझा "स्नेहिल "