Sunday, July 24, 2011

दोहा

लोकतंत्र की गाय को दुह कर कर दी ठांठ .
जनसेवी माखन भखें जन को दुर्लभ छांछ.

Saturday, January 22, 2011

सूरज हो मुकाबिल तो शरारा नहीं टिकता ।
दिन में कोई आकाश में तारा नहीं दिखता ॥

मुश्किल में बदल जाते हैं हर नाते और रिश्ते-
रोने को भी काँधे का सहारा नहीं दिखता ।

ईमान की कीमत न चुका पाओगे मेरे-
वरना सर-ए-बाज़ार यहाँ क्या नहीं बिकता ।

सरकारें बदल बदल के यह देख लिया है-
हालात बदल पाने का चारा नहीं दिखता ।

संसद पे जमा रक्खा है बगुलों ने यूँ कब्ज़ा-
हंसो का सियासत मे गुज़ारा नहीं दिखता ।

Tuesday, May 11, 2010

पहले किसको फांसी दोगे तुम कसाब या अफज़ल को

कैसे रोक सकोगे बोलो उग्रवाद के हलचल को .
पहले किसको फांसी दोगे तुम कसाब या अफज़ल को ?

Friday, January 1, 2010

रात की क़ैद में हैं उजाले

रात की क़ैद में हैं उजाले ।
बैठे हम हाथ पर हाथ डाले

लाश पहचान में आ सकी ना -
चील कौओं ने यूँ नोच डाले।

राज फैला है तब तब असत् का -
सत्य ने जब भी हथियार डाले ।

राह में आ गया जो भी पत्थर -
पाँव से हम उसे तोड़ डाले ।

रोएगी मौत पर मेरे दुनिया -
देखकर के मुझे मुस्करा ले ।

सब्र का बाँध जब टूटता है -
दिल संभलता नहीं है संभाले ।

गर्म बाज़ार हैं कुर्सियों के -
दाम इतने सदन ने उछाले।

वह अदालत में सच कैसे बोले-
होंठ पर खौफ के हैं जो ताले ।

- विनय ओझा 'स्नेहिल'

Sunday, November 8, 2009

“समलैंगिकों और किन्नरों को सरकारी पदों पर शत प्रतिशत आरक्षण”



मैं सोच रहा हूं कि केन्द्र सरकार को एक पत्र लिखूं और कुछ सुझाव दूँ ताकि अरसों से अपनी गरिमा और अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष करते आ रहे लोगों (समलैंगिकों तथा किन्नरों) के आन्दोलन में सहभागिता का गौरव अर्जित कर सकूँ। इससे देश की ढेर सारी सामाजिक और राजनैतिक समस्याओं जैसे दहेज, भ्रष्टाचार, महंगाई आदि को कुछ ही सालों में जड़ से खत्म किया जा सकेगा। जबकि अब तक की लगभग सभी सरकारें इन्हें खत्म करने का दावा तो करती रही हैं किंतु इन्हें असाध्य रोग मान कर एड्स की तरह औपचारिक रूप से इलाज करती रही हैं और यह सोच कर कि जनता की गरीबी तो मिटा नहीं सकते, चलो अपनी ही मिटा लें। आज़ादी के बाद से सभी सरकारों और राजनेताओं ने, चाहे वे किसी भी दल के हों, इसी तरीके से जनसेवा की है और ऐसे ही करते जाने की आशा है।

अरे आप को आश्चर्य हो रहा होगा कि समलैंगिकों तथा किन्नरों के आन्दोलन और गरीबी, भ्रष्टाचार तथा महँगाई का इंससे क्या सम्बन्ध है? मै कहता हूँ यही तो हमारे शोध का विषय है। यदि समलैंगिकों तथा किन्नरों को संसद, न्यायपालिका और पुलिस विभाग में शत प्रतिशत आरक्षण दे दिया जाय तो न केवल भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल जाएगी बल्कि सदियों से उपेक्षित इस अल्पसंख्यक समुदाय के सम्वैधानिक अधिकारों की रक्षा भी होगी। साथ ही ढेर सारी समस्याओं का एक ही साथ समाधान हो जाएगा। समलैंगिकों का कोई परिवार नहीं होता। बस वह और दूसरा साथी। परिवार तो उनके साथ रहने का साहस जुटा ही नहीं पाता, इसलिए उनसे रिश्ता ही तोड़ लेता है। बच्चे पैदा होने और उनके पालन पोषण ,शिक्षा-दीक्षा, शादी व्याह के खर्चों की दूर- दूर तक कोई सम्भावना नहीं रहती है। दूर दूर तक रिश्तेदारी में भी कोई अपने बच्चे को इनके साथ रहने की अनुमति देना खतरे से खाली नहीं समझता। इस महँगाई और आर्थिक मन्दी के दौर में ईमानदार आदमी किसी तरह से रोटी-दाल और बाल बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में जीवन भर तबाह रहता है और उसके आदर्शों तथा ईमानदारी को समाज के विकसित लोग मूर्खता का पर्याय समझ कर उसका मज़ाक उड़ाते हैं। ऐसे में जब इन सरकारी विभागों में समलैंगिकों को आरक्षण दिया जाएगा तो निश्चित रूप से भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकेगा। क्योंकि उनके पास न तो असीमित परिवार होंगे और न उन पर खर्च। ऐसी स्थिति में सरकार की ओर से दिया जाने वाला वेतन बड़ी कठिनाई से खर्च हो सकेगा। जिसका परिणाम यह होगा कि पग–पग पर चौराहों पर तैनात ट्रैफिक पुलिस बस, मोटरसायकिल और ट्र्क वालों को रोक रोक कर उनसे वसूली करती नज़र नहीं आएगी। तब थानों पर तैनात पुलिस अपेक्षित धाराओं में अपेक्षित व्यक्ति के विरुद्ध अपराध को अंकित करने के लिए सौदेबाज़ी करती नज़र नहीं आएगी। न्यायालयों मे ऐसे दृश्य नहीं दिखेंगे जब कुर्सी पर बैठा न्यायाधीश अपनी गर्दन नीचे कर अपनी अनभिज्ञता का दिखावा करने लगता है और पेशकार हर मुकदमे में तारीख की रिश्वत आधिकारिक रूप से लेता रहता है, जिनको कि अन्याय से लड़ने के लिए ही सरकारी पद पर आधिकारिक रूप से बिठाया गया है। तब राजनेता अपनी सात पुश्तों तक को सुखी बनाए रखने के लिए लोक कल्याणकारी योजनाओं में लगने वाले धन का घपला नहीं किया करेगा। सरकारी सेवकों और लोकसेवकों को जिनके परिवार के खर्च उनकी आय से ज्यादा हो जाया करते हैं और उन्हें असुरक्षा की भावना सताती है, परिणाम-स्वरूप उन्हें आय से अधिक सम्पत्ति अर्जित करने का जुगाड़ करना पड़ता है और जन कल्याणकारी योजनाओं में लगने वाले धन में हेराफेरी करनी पड़ती है, उन्हें ऐसा करने को बाध्य नहीं होना पड़ेगा। तब हर महीने उन्हें कच्छप गति से चलती हुई वेतनवृद्धि और खरगोशी चाल से चलती महँगाई में तालमेल बिठाते हुए भ्रष्ट होने के लिए मज़बूर नहीं होना पड़ेगा।
हर मर्ज़ का एक ही इलाज़- न रहेगा बाँस और न बाजेगी बाँसुरी। सारे सरकारी विभागों में शत-प्रतिशत आरक्षण समलैंगिकों और किन्नरों का। ऐसा करने में कुछ साल लगेंगे जब सारे परिवारविहीन लोग होंगे सरकारी संस्थाओं में तब दूर-दूर तक भ्रष्टाचार का नामोनिशान नहीं होगा। पुलिस, न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका कानून के अनुसार चलने प्रारम्भ हो जाएंगे और पूरे देश में समरसता आ जाएगी, जिसे लाने का झाँसा अब तक समाजवादी और कम्युनिस्ट देते रहे हैं और तब वह सपना पूरा हो सकेगा जिसे आज़ादी के परवानों ने अपने खून से सींचा था।
अभी कुछ साल पहले की बात है जब उत्तर प्रदेश में गोरखपुर की जनता ने एक शोध किया था। मेयर पद पर एक किन्नर को बिठा दिया गया था। तब यह अनुभव किया गया कि ऐसे लोग जिनका परिवार नहीं होता रिश्वतखोरी और कमीशनखोरी के चक्रव्यूह में फँसे बिना समाज की सेवा करते हुए देश को विकास की दिशा में आगे ले जा सकते हैं। तभी से मैने यह सोंचना प्रारम्भ कर दिया कि अगर भारत से भ्रष्टाचार रूपी कोढ़ का उपचार करना है तो एक ही तरीका है, सभी सरकारी विभागों में शत प्रतिशत आरक्षण समलैंगिकों और किन्नरों के लिए। वैसे तो यह कार्यक्रम लम्बा खिंच सकता है, लेकिन प्रयोग के तौर पर सरकारी विभागों के प्रमुखों और प्रभारी के पदों पर ऐसे अल्पसंख्यकों की नियुक्तियाँ कर शुरुआत तो की ही जा सकती है

-विनय ओझा














Monday, October 5, 2009

जनता बनाम पशु – एक व्यंग्य

भारतीय लोक तंत्र में कार्यपालिका और न्यायपालिका की समझ में थोड़ा फर्क है। न्यायपालिका बार बार अपने निर्णयों में कहती रहती है कि संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन के अधिकार का आशय पशुवत जीवन से नहीं है, अपितु मनुष्य के प्रतिष्ठा-पूर्ण जीवन का अधिकार है। जबकि कार्यपालिका की समझ कुछ अलग हट कर है। वह क्या है इसे खुल कर बताने की आवश्यकता नहीं है।

केन्द्र सरकार में एक मंत्री जी हैं, जो यथार्थवादी हैं। जब आम चुनाव चल रहे थे तब दूसरे-तीसरे दिन उनके लेख “टाइम्स ऑफ इन्डिया” में छपते थे,तब मुझे यही लगता था कि चुनाव बाद इस समाचार पत्र को टेक ओवर कर लेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उनके अनुसार हवाई जहाजों के ‘एकोनामी क्लास’ मे यात्रा करना भेड-बकरियों के साथ यात्रा करने के समतुल्य है, इसी लिए ‘एकोनामी क्लास’ को उन्होंने ‘कैटल-क्लास’ की संग्या दे डाली।वे यथार्थ-वादी हैं उन्हें पता है कि भारत में आम जनता के जीवन और पशुओं के जीवन में कोई विशेष अंतर नहीं है। जो पाँच सितारा होटलों में महीनों पार्टी के खर्च पर रहा हो और बिजनेस क्लास में हवाई यात्राओं का आनंद उठाने का आसक्त हो गया हो, उसे ‘एकोनामी क्लास’ ‘कैटल-क्लास’ लगेगा ही, और साधारण होटल का खाना पशुओं के स्तर का खाना लगेगा ही। परंतु सच्चाई यह है कि वह ठहरे एक यथार्थवादी लेखक और उन्हें राजनेता बने कुछ ही माह ही हुए हैं, अभी तक उन्होंने यह नहीं सीखा कि राजनीति में सोंचने के कुछ और बोलने के कुछ और ही विचार और स्वर होते हैं। यदि उन्हें उलट दिये जाँय तो फूलों की जगह जूतों की माला पहननी पड़ेगी। जैसे जनता भेड़ है, उसकी अपनी कोई सोंच और स्वतंत्र बुद्धि नहीं होती। उसे चारा दिखाकर भेड़-बकरियों की तरह कहीं भी और किसी भी दिशा में हाँका जा सकता है। उसे शराब, कम्बल और पैसे बाँट कर अपने दल को मत देने के लिए आकर्षित किया जा सकता है। फिर पाँच वर्ष तक उसे अंगूठा दिखा कर जोंक की तरह उसकी जन-कल्याणकारी योजनाओं का फंड चूसा जा सकता है। यदि यही विचार जनता के सम्मुख प्रकट कर दिए जाएं तो पिटाई सुनिश्चित है। जनता पिल पड़ेगी यह कहते हुए कि देखो साला जनता को भेड़ कह रहा है,जोंक की तरह जनता का खून चूसने की बात कह रहा है, पीटो साले को। फिर जनता शुरू। अभी पिछले आम चुनाव में तो राज-नेताओं पर जूते फेंकने की शुरुवात हो चुकी है,अगले आम चुनाव का क्या भविष्य है ज्योतिषी ही बता सकता है। इसी आशंका के चलते उसे ज़ेड कैटेगरी की सुरक्षा की आवश्यकता पड़ती है।क्योंकि जनता तो तैयार बैठी है,उन्हें भी पता है कि कैसे कैसे कर्म किए हैं हमने।
प्रतिष्ठा जनता की नहीं, उसकी सेवा करने की झूठी कसम खाने वाले जनसेवियों की ही होती है। आम आदमी को अचानक कहीं जाना है, रेल की शायिका में सीट नहीं मिली,जाना जरूरी है, सामान्य डिब्बे मे यात्रा कर ली। जब जरूरत पड़ी बस की यात्रा कर ली । ज्यादा मजबूरी आई, आटो-रिक्शा से यात्रा कर ली और 80 रूपए बनते थे 160 रूपए देने पड़े फिर भी उसकी प्रतिष्ठा नहीं घटती, किंतु जन-सेवी यदि बस में यात्रा कर लेगा तो उसकी प्रतिष्ठा घट जाएगी। आज तक मैंने किसी जन-सेवी को बस में यात्रा करते नहीं देखा। पता नहीं इस जीवन में ऐसा सुखदायी दृश्य देख सकूंगा कि नहीं, संदेह होता है । तभी तो वह खास आदमी है वरना फर्क ही क्या है आम आदमी और खास आदमी में। आदमी तो आदमी ही होता है।उसके भीतर के गुण नहीं, बल्कि उसके संसाधन ही उसे आम और खास बनाते हैं। आम आदमी कितना ही खास काम करे, उसकी कोई पूंछ नहीं होती, बल्कि इसके विपरीत खास आदमी का आम आदमी जैसा काम भी खास बना देता है। जैसे राहुल गांधी खास आदमी हैं, ऐसी बात नहीं कि उनको सुरखाब के पर लगे हुए हैं, उनकी खासियत यह है कि वे राजीव गांधी के बेटे हैं। राजीव गांधी की खासियत यह थी कि वह इन्दिरा गांधी के बेटे थे। उनकी खासियत यह थी कि वह नेहरू जी की बेटी थीं। नेहरू जी की खासियत यह थी कि वह गान्धी जी के खास लोगों में से थे, इस लिए देश के पहले प्रधान-मंत्री बने थे। क्योंकि कांग्रेस में गांधी जी की चलती थी, इसी लिए नेता जी सुभाष चन्द्र बोस को अध्यक्ष चुने जाने के बावज़ूद कांग्रेस की अध्यक्षता से त्यागपत्र देना पड़ा था। अब राहुल गांधी चूंकि खास आदमी हैं उनका हर काम खास बन जाता है। मीडिया वाले कैमरा लेकर उनके पीछे-पीछे भागते रहते हैं । राहुल गांधी रात भर कलावती( जो आम महिला है) के घर में रात भर रुके, उसका दुःख-दर्द महसूस किया। कलावती के साथ खाना खाया तो पता चला कि आम आदमी को किस स्तर का खाना नसीब होता है। आम आदमी के पास भी उनकी तरह स्वाद लेने को जीभ और भरने को पेट होता है, यह और बात है कि वह उनका उपयोग उस तरह नहीं कर पाता जितना कि खास आदमी कर लेता है। यह भी देखा कि कलावती के बच्चे किस स्तर की शिक्षा सरकारी स्कूलों से पा रहे हैं, जिनका स्तर उसी तरह न सुधारे जा सकने योग्य है जिस प्रकार किसी राजनेता का चरित्र । यह सब अनुभव लेने के बाद कुछ आर्थिक सहायता (भिक्षा) दे कर विदा हो लिये। कलावती के दुःख की कथा उन्होंने संसद में सुनाई जो तत्कालीन प्रधान मंत्री के विश्वास मत परीक्षण में सहानुभूति बटोरने के काम आई और मीडिया ने तेज़ी से खबर को लपका, जिससे कलावती आम महिला से खास महिला बन गयी। कलावती और भी खास बन जाती यदि उसे कांग्रेस से टिकट मिल जाता। किंतु राहुल गांधी का उद्देश्य उसे इतना खास बनाने का नहीं था, ऐसी गलती कांग्रेस पार्टी थोड़े न करेगी। अरे ऐसी गलती कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं करेगी। यही तो राजनीति का सिद्धांत है। किसी कमज़ोर को इतना ताकतवर मत बनने दो कि वह तुम्हारी छाती पर चढ़ कर हिसाब किताब मांगने लगे। ऐसे ही एक दिन राहुल गांधी अचानक राजधानी से लापता हो गए, पता चला कहीं किसी गाँव में आम मजदूरों की तरह तसला सिर पर रख कर मिट्टी ढो रहे हैं और उनके पीछे-पीछे मीडिया वाले कैमरा लेकर उनके श्रमदान का लाइव टेलीकास्ट कर उनके गांधी-वादी होने की सार्वजनिक घोषणा कर रहे हैं। क्योंकि खास आदमी आम आदमी जैसा काम कर रहा है। कितना दुर्लभ होता है भारत में ऐसा दृश्य।

आज़ादी के बाद से सभी राज-नेताओं ने एक मुहिम चलाई– ‘प्रॉस्पेरिटी ड्राइव’। गरीबी हटाओ का दिखावटी नारा देकर सभी ने अपनी गरीबी हटा ली। जनता जस की तस। अभी तक जनता की गरीबी हटाने की बारी ही नहीं आई । जिसे जनता गरीबी हटाने और समृद्धि लाने वाली सरकार मानती रही वह अपने को समृद्ध बनाने की मुहिम या ‘प्रॉस्पेरिटी ड्राइव’ चलाती रही। अब जहाँ आम आदमी सूखा,आर्थिक मन्दी और कमर-तोड़ महँगाई, बेरोज़गारी से जूझ रहा है, वहीं राजनेताओं के ऐश्वर्य और सुविधाभोगी जीवन कांग्रेस के भीतर अपराध बोध को जन्म दे रहा है, जिस पूर्वाग्रह के मानसिक उपचार हेतु वह अब ‘आँस्टेरिटी ड्राइव’ चला रही है जिससे उसे जनता का असली शुभ-चिंतक होने का प्रमाणपत्र समझा जाए । किंतु एक यथार्थ-वादी लेखक जो कांग्रेस के ही हैं और मंत्री भी हैं सरकारी कार्य के लिंए हवाई जहाजों में ‘बिजनेस क्लास’ के लिए अधिकृत होते हुए भी ‘आँस्टेरिटी ड्राइव’ के तहत ‘एकोनोमी क्लास’ में यात्रा करने की खिल्ली उड़ाते हैं और उसे कैटल क्लास जिसका आशय पशुओं का दर्ज़ा से है, कहते हैं। यद्यपि उनके इस बयान की हर तरफ बड़ी आलोचना हुई लेकिन मैं उसका अति यथार्थवादी होने के कारण समर्थन करता हूं। भारत की जनता को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है- एक ‘इलाइट क्लास’ और दूसरा ‘कैटल क्लास’। राजनेता, ब्यूरोक्रैट, उद्योगपति, व्यापारी सभी इलाइट क्लास में आते हैं, बाकी सारे लोग ‘कैटल क्लास’ में रखे जा सकते हैं। ऐसे लोगों का जीवन,रहन-सहन,खान-पान,शिक्षा-दीक्षा,यातायात के साधन से लेकर होटल,चिकित्सालय,सुरक्षा व्यवस्था अपने अपने क्लास के हिसाब से रहता है।

अभी कुछ ही दिनों पहले की दिल्ली की एक घटना है। एक 14 वर्षीय बालिका को उसके पड़ोसी ने उसका अपहरण कर लिया। उसके परिवार वालों ने प्राथमिकी दर्ज़ कराने के लिए थाने पर सम्पर्क किया और अपहरण का मुकद्मा कायम करने का बार-बार अनुरोध किया।सम्भवतः अनुरोध के तरीके में कोई कमी रही होगी। कभी–कभी मुकद्मा लिखाने वाले से मुकद्मा न लिखने देने वाला ज्यादा प्रभावशाली सिद्ध होता है।क्योंकि इस देश में मुक्द्मे का अपेक्षित धारा में, अपेक्षित व्यक्ति के विरुद्ध कायम कराया जाना न्याय की वह लड़ाई है, जो न्यायालय से बाहर थाने पर लड़ी जाती है। थानेदार ने अपहरण का मुकद्मा लिखने से मना कर दिया और यह कहा कि मुकद्मा गुमशुदगी का ही दर्ज़ हो सकता है। छः माह तक बहस चलती रही और मुकद्मा गुमशुदगी का ही दर्ज़ हो पाया । लड़की के पिता ने जब हार मान कर उच्च न्यायालय में याचिका दायर की तो उसके हस्तक्षेप पर अपहरण का मुकद्मा कायम हुआ और खोज बीन शुरु हुई। परिणामस्वरूप लड़की लुधियाना से बरामद हुई,तब पता चला कि वह आठ माह की गर्भिणी है। वैसे तो दिल्ली पुलिस की पेट्रोलिंग कार पर लाल और बड़े अक्षरों में लिखा रहता है- “हम बड़ी तेज़ी से काम करते हैं”, बिल्कुल सच, तभी तो उसने छः माह में प्राथमिकी दर्ज़ कर आठ माह में उस 14 वर्षीय बालिका को बरामद कर सक्रियता दिखाई जिसका अपहरण करने वाले का नाम, पता और हुलिया सब मालूम था। अरे यू.पी.पुलिस होती तो बरामद करते करते बच्ची 3-4 बच्चों की माँ बन चुकी होती। उसके पिता जी कहते बेटी, विधाता ने तुम्हारे भाग्य में शायद यही लिखा था, अब होनी को कौन टाल सकता है, अब कौन तुम्हारे साथ विवाह करेगा इसी अपहर्ता को अपना जीवन साथी मान कर शेष जीवन बिताओ। एक चौदह वर्ष की बालिका का पूरा जीवन नष्ट हो गया किंतु उत्तर-दायित्व किसी का नहीं। उस परिवार की कोई प्रतिष्ठा नहीं है क्यों कि वह सामान्य आदमी यानि कैटल क्लास का है । वहीं उसके स्थान पर कोई धनी या राजनैतिक पृष्ठ-भूमि का व्यक्ति होता तो पुलिस विभाग वाले, सारे मीडिया वाले और टी. वी. चैनल आसमान सिर पर उठा लेते और स्थिति यहाँ तक नहीं पहुँचती ।

-विनय कुमार ओझा

Friday, September 25, 2009

“राम तेरी गंगा मैली हो गई” - एक व्यंग्य

राम तेरी गंगा मैली हो गई’ फिल्म देखी होगी। यह फिल्म प्रधान मंत्री ने भी देखी। प्रधान मंत्री जी भले आदमी हैं। उन्होंने मंत्रियों की एक बैठक बुलाई और यह चर्चा की कि गंगा हमारी माता के समान है, और मैली हो गई हैं लिहाज़ा उनकी सफाई हमारी जिम्मेदारी है और इस सन्दर्भ में क्या किया जा सकता है? गैर सरकारी संगठनों और परियोजना विशेषग्यों से विचार-विमर्श करने पर पता चला कि कई करोड़ रूपए खर्च होंगे फिर भी उसके स्वच्छ होने की कोई गारंटी नहीं है। अब देखिए न दिल्ली में यमुना की सफाई का भगीरथ प्रयास किया हमने, परिणाम यह हुआ कि यमुना जी ही साफ हो गयीं। तो एक ने कहा कि गंगा जी साफ नहीं हो सकती हैं। उन्होंने पूँछा- ऐसा क्यों? उत्तर आया-साहब फिल्म का तात्पर्य है कि लोग गन्दे हो गए हैं,राजनीति गन्दी हो गई है। समाज गन्दा हो गया है। सारा सरकारी तंत्र भ्रष्टाचार के कोढ़ से अपंग हो गया है। जब तक ये लोग अपना पाप धोने के लिए गंगा स्नान करने प्रति वर्ष जाते रहेंगे, गंगा मैली ही रहेगी। उन्होंने पुनः प्रश्न किया-फिर क्या किया जा सकता है? उत्तर आया-सरकार गंगा माता से पहले पूरे सरकारी तंत्र की सफाई करनी पड़ेगी। सबके भीतर से भ्रष्टाचार के वायरस को निकालना होगा जो कोढ़ बन कर फूट रहा है। प्रधान मंत्री जी जेब से सूआ निकाल कार सिर खुजाते हुए कहते हैं कि फिर क्या किया जा सकता है? किसी ने कहा कि सरकारी तंत्र की सफाई तो सम्भव नहीं है क्यों कि राजनेताओं में इस बात पर आम सहमति बननी सम्भव नहीं है। चलिए गंगा की ही सफाई करते हैं। प्रश्न आया करोड़ों रूपए का खर्च कहाँ से आएगा? किसी ने कहा स्विस बैंक से सारा पैसा निकाल कर गंगा माता की सफाई में लगा देते हैं। एक स्वर आया कि हाँ सरकार अच्छा विचार है। दो नंबर का पैसा एक नंबर के काम में लग जएगा। दिव्य नदी का पावन जल सवच्छ हो जाएगा और फिर संतों द्वारा टी.वी. चैनलों पर प्रचार करा दिया जाएगा कि कांग्रेस ने गंगा माता की सफाई कराई है, जो आज तक कोई दल नहीं कर पाया । इस प्रकार लोगों के मन में कांग्रेस के प्रति अगाध श्रद्धा उमड़ेगी और हम फिर चुनाव जीत कर सत्ता में आ जाएंगे और फिर हमारा सरकारी तंत्र जो पैसा कमाएगा स्विस बैंक में वापस जमा कर देंगे। किसी ने कहा हाँ सरकार ‘रीकरिंग डिपोजिट’ खोला जा सकता है । तभी पीछे से एक स्वर आया कि स्विस बैंक में क्या तुम्हारे बाप का पैसा है। सरदार जी ने फिर सिर खुजाते होए बोला फिर वापस चला आएगा ना । पीछे से एक स्वर आया-वह कैसे? वर्तमान चुनाव आयुक्त की कांग्रेस पर पूरी निष्ठा है। चुनाव आयुक्त की इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों पर पूरी निष्ठा है,क्यों कि सॉफ्ट- वेयर उन्ही के डलवाए हुए हैं । जनता वोट के लिए चाहे कोई बटन दबाए पर गिनती कांग्रेस के ही झोली में जाएगी,किंतु कुछ भी हो पैसा स्विस बैंक से नहीं निकलेगा। मीडिया को पता चल गया तो डंका बज जाएगा कि पैसा किस पार्टी का है। कई दसकों से चले आ रहे रहस्य का पटाक्षेप हो जाएगा कि स्विस बैंकों में खाते किसी उद्योग पति के हैं या किसी समर्पित जन-सेवी के ।
तब तक एक वकील साहब का उर्वर मस्तिष्क काम कर गया। उन्होंने कहा कि हर्र लगे ना फिटकिरी रंग भी चोखा होय। गंगा का मैलापन राष्ट्रीय स्तर का है जिसे साफ नहीं किया जा सकता है। दोनों में एक समानता है इस राष्ट्र की राजनीति को जिस तरह साफ नहीं किया जा सकता है, उसी तरह गंगा का मैलापन भी साफ नहीं किया जा सकता है, क्योंकि वही मन के मैले लोग गंगा में फिर डुबकी लगाएंगे और फिर गंगा मैली की मैली। ऐसे में यदि साफ सुथरा व्यक्ति भी गंगा स्नान करेगा तो वह भी मैला हो जाएगा।इस लिए गंगा का मैलापन एक राष्ट्रीय समस्या बन गई है।उसमें स्नान करके स्वच्छ होने के बज़ाय पूरा देश गन्दा हो गया है। इस लिए इसे राष्ट्रीय नदी का दर्जा दे देना चाहिए। इससे अगले आम चुनाव में हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण कांग्रेस के पक्ष में हो जाएगा और यह चुनाव परिणाम भी हमारे पक्ष में हो जाएगा । तभी एक अधिसूचना जारी की गई कि गंगा एक राष्ट्रीय नदी हैं। परिणाम स्वरूप जो हाल राष्ट्रीय पशु चीता, राष्ट्रीय पक्षी मोर का है वही हाल राष्ट्रीय नदी गंगा माता का होने वाला है।