Tuesday, October 23, 2012

नई ग़ज़ल

  हर बात में कहते हैं वो मुझसे कि  तुम्हे क्या ?
माली चमन को लूट के खाए तो तुम्हे क्या ?

सुनवाई हुई पूरी सज़ा बरकरार है -
फांसी पे न हम उसको चढ़ाएं तो तुम्हे क्या?

ज़म्हूरियत में चुनना सिर्फ  सबका फ़र्ज़ है -
 रहज़न उम्मीदवार है तो इससे तुम्हे क्या ?

दर दर पे सिर झुकाके है सेवा का व्रत लिया-
फिर पांच साल हाथ न आयें तो तुम्हे क्या ?

मेरे ही बुजुर्गों ने बसाई थीं बस्तियाँ -
मैं आग अगर उनको लगाऊं तो तुम्हे क्या  ?

इस देश का पैसा तो विदेशों में जमा है -
इस देश में वापस नहीं लाएं तो तुम्हे क्या ?

मेरा वज़ीरेआज़म तो ईमानदार है-
आरोपों की न जांच कराए तो तुम्हे क्या  ?

विनय ओझा 'स्नेहिल'

Tuesday, June 5, 2012

संसद बनाम जनता

अन्ना हजारे जी के साथ जब पूरा देश लोकपाल बिल के लिए आन्दोलन कर रहा था तब सारे सांसद, विपक्ष को छोड़ करएक स्वर में घोषणा कर रहे थे कि संसद  सर्वोच्च है। क़ानून बनाने का काम संसद का है और प्रत्येक सर्वोच्च संस्था को यह विशेष अधिकार होता है कि वह कार्य करे या न करे तभी तो वह सर्वोच्च है। उसी तरह संसद को इस बात की भी स्वतंत्रता होती है कि सही क़ानून बनाए या गलत क़ानून बनाए , कमज़ोर क़ानून बनाए या मज़बूत क़ानून बनाए या कोई भी कानून न बनाए । उसके ऊपर कोई दबाव बनाना उसकी सर्वोच्चता को चुनौती देना है, और ऐसा करना संसदीय विशेषाधिकार का उल्लंघन है । उसकी सर्वोच्चता को चुनौती देने का परिणाम बाबा रामदेव अच्छी तरह समझ चुके हैं किन्तु अन्ना जी को समझाने में अभी समय लगेगा।


सरकार बार बार समझाती रही कि लोकपाल  से ही भ्रष्टाचार नहीं मिटेगा। इसके लिए ढेर सारे कदम उठाने पड़ेंगे, किन्तु यक्ष प्रश्न यह है कि वे कदम कब उठाए जाएँगे और उन्हें उठाने से कौन से लोग रोक रहे हैं। एक दो बार को छोड़ दें तो आज़ादी के बाद से अब तक कांग्रेस ही केंद्र में रही है पर वे कदम क्यों नहीं उठाए गए इसका जवाब कोई और ही देने को तैयार है। आज अब भ्रष्टाचार रुपी का कोढ़ का वाइरस पूरे लोकतंत्र की नसों में इस तरह फ़ैल चुका है कि अब उपचार के आशा की कोई किरण ही नहीं दिखाई देती ।


कभी राजीव गाँधी जी ने अनुभव किया था कि किसी विकास योजना के तहत सौ पैसा दिल्ली से चलता है तो गाँव तक पहुँचते पहुँचते मुश्किल से दस पैसा रह जाता है । किन्तु राजीव जी बहुत भोले व्यक्ति थे उन्हें यह पता नहीं था कि नब्बे पैसे कहाँ पहुँच रहे हैं । एक दो बार राहुल जी ने भी वही बात दुहराई है शायद वह भी उतने ही भोले हैं । किन्तु अन्ना हजारे और भारत की सारी जनता को पता है कि उन विकास योजनाओं के नब्बे पैसे कहाँ चले गए और उन्हें वापस लाने के लिए आन्दोलन चलाने वाले बाबा रामदेव और उनके साथ के लोगों का क्या हाल हुआ ।


पहले तो दुष्प्रचार किया गया कि अन्ना जी भी दूध के धुले नहीं हैं , फ़ौज के भगोड़े हैं , उन्होंने सरकारी अनुदान का घपला किया है, आर एस एस के एजेंट हैं बी जे पी के लोग उन्हें बरगलाकर इस्तेमाल कर रहे हैं आदि आदि ..लेकिन अन्ना टीम आन्दोलन पर आमादा थी । दिन पर दिन अनशन के बढ़ते गए , जन सैलाब उमड़ता गया, जनाक्रोश बढ़ता जा रहा था और सरकार घिरती गई और अंत में पूरी संसद ने एक स्वर में संकल्प प्रस्ताव पारित किया कि हम आदरणीय अन्ना जी की भावना का सम्मान करते हैं और आश्वस्त करते हैं कि कि एक सशक्त लोकपाल बिल ला कर दिखाएंगे किन्तु इसमें थोडा समय लगेगा । उपवास टूट गया।फिर संसद की सर्वोच्चता  का भाव जागा ।  लोक पाल बिल का मसौदा पेश हुआ और लोक सभा में बहस शुरू हुई ।
 लोक सभा में बहस की तीन धारा  थी । पहली  धारा यह थी कि  संसद सर्वोच्च है, उसे जैसा चाहे वैसा क़ानून बनाने का विशेष अधिकार है । इस विशेषाधिकार में क़ानून न बनाने का भी विशेषाधिकार है, इस पर क़ानून बनाने के लिए  दबाव बनाना भी विशेषाधिकार का उल्लंघन है । बहस की दूसरी धारा यह थी कि लोक पाल कितना मज़बूत हो ? लालूजी और मुलायम जी का कहना था कि  लोक पाल इतना मज़बूत न हो कि  सरकार की ही छाती पर चढ़ बैठे और कहने लगे कि मार दिया जाय कि  छोड़ दिया जाय ,बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाए ? बहस की तीसरी धारा यह थीकि लोकायुक्त बना कर राज्यों की स्वायत्तता न छीनी जाए ।राज्यों को अपने विषय पर क़ानून बनाने का निरापद अधिकार है ।राज्य के विषय पर राज्य की विधायिका सर्वोच्च है । सर्वोच्च  संस्था की संविधान में कोई  स्पष्ट लक्ष्मण रेखा नहीं खींची गयी है ।लोकायुक्त की नियुक्ति की बात  मानने में राज्यों की विधायिका की सर्वोच्च्ता को ख़तरा है । संविधान की भूमिका में साफ लिखा गया है कि हम भारत के लोग समाजवादी धर्म निपेक्सह्य , लोकतान्त्रिक गणराज्य की स्थापना हेतु संविधान को लोकार्पित करते हैं ।चुनाव के बाद जिस संविधान की शपथ खाते हुए जिस जनता की सेवा करने के लिए संकल्प लिया जाता है  फिर  वे लोग कोइ  महत्व नहीं रखते हैं । असली बात यह है कि  पांच साल तक संसद सर्वोच्च रहती है फिर चुनाव आता है और तब जो पांच साल तक संसद की सर्वोच्चता की दुहाई देते थे वही लोग गाँव -गाँव,गली- गली, शहर शहर शराब, पैसे और  कम्बल बांटते हैं और दोनो हाथ जोड़ कर भिखारियों की तरह दीन-हीन भाव दिखाते हुए वोट मांगते हुए  कहते हैं कि जनता सर्वोच्च है । दस खलनायकों को खडा कर उनमें से एक को  जन नायक चुनने की अपील करते हैं और हम उनमें से एक खलनायक को  बेचारगी  से जन नायक चुन कर संसद में भेज देते हैं ।वही जब सदन में पहुँच जाता है फिर जोर से चिल्लाता  है कि  संसद सर्वोच्च है और जनता पांच साल तक ठगी- ठगी सी रह जाती है और वे  करोड़ों जनता को अंगूठा दिखा दिखा कर पांच साल तक कहते हैं कि  संसद सर्वोच्च है । विनय ओझा 'स्नेहिल' at 6:40 AM Labels: व्यंग


Sunday, July 24, 2011

दोहा

लोकतंत्र की गाय को दुह कर कर दी ठांठ .
जनसेवी माखन भखें जन को दुर्लभ छांछ.

Saturday, January 22, 2011

सूरज हो मुकाबिल तो शरारा नहीं टिकता ।
दिन में कोई आकाश में तारा नहीं दिखता ॥

मुश्किल में बदल जाते हैं हर नाते और रिश्ते-
रोने को भी काँधे का सहारा नहीं दिखता ।

ईमान की कीमत न चुका पाओगे मेरे-
वरना सर-ए-बाज़ार यहाँ क्या नहीं बिकता ।

सरकारें बदल बदल के यह देख लिया है-
हालात बदल पाने का चारा नहीं दिखता ।

संसद पे जमा रक्खा है बगुलों ने यूँ कब्ज़ा-
हंसो का सियासत मे गुज़ारा नहीं दिखता ।

Tuesday, May 11, 2010

पहले किसको फांसी दोगे तुम कसाब या अफज़ल को

कैसे रोक सकोगे बोलो उग्रवाद के हलचल को .
पहले किसको फांसी दोगे तुम कसाब या अफज़ल को ?

Friday, January 1, 2010

रात की क़ैद में हैं उजाले

रात की क़ैद में हैं उजाले ।
बैठे हम हाथ पर हाथ डाले

लाश पहचान में आ सकी ना -
चील कौओं ने यूँ नोच डाले।

राज फैला है तब तब असत् का -
सत्य ने जब भी हथियार डाले ।

राह में आ गया जो भी पत्थर -
पाँव से हम उसे तोड़ डाले ।

रोएगी मौत पर मेरे दुनिया -
देखकर के मुझे मुस्करा ले ।

सब्र का बाँध जब टूटता है -
दिल संभलता नहीं है संभाले ।

गर्म बाज़ार हैं कुर्सियों के -
दाम इतने सदन ने उछाले।

वह अदालत में सच कैसे बोले-
होंठ पर खौफ के हैं जो ताले ।

- विनय ओझा 'स्नेहिल'

Sunday, November 8, 2009

“समलैंगिकों और किन्नरों को सरकारी पदों पर शत प्रतिशत आरक्षण”



मैं सोच रहा हूं कि केन्द्र सरकार को एक पत्र लिखूं और कुछ सुझाव दूँ ताकि अरसों से अपनी गरिमा और अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष करते आ रहे लोगों (समलैंगिकों तथा किन्नरों) के आन्दोलन में सहभागिता का गौरव अर्जित कर सकूँ। इससे देश की ढेर सारी सामाजिक और राजनैतिक समस्याओं जैसे दहेज, भ्रष्टाचार, महंगाई आदि को कुछ ही सालों में जड़ से खत्म किया जा सकेगा। जबकि अब तक की लगभग सभी सरकारें इन्हें खत्म करने का दावा तो करती रही हैं किंतु इन्हें असाध्य रोग मान कर एड्स की तरह औपचारिक रूप से इलाज करती रही हैं और यह सोच कर कि जनता की गरीबी तो मिटा नहीं सकते, चलो अपनी ही मिटा लें। आज़ादी के बाद से सभी सरकारों और राजनेताओं ने, चाहे वे किसी भी दल के हों, इसी तरीके से जनसेवा की है और ऐसे ही करते जाने की आशा है।

अरे आप को आश्चर्य हो रहा होगा कि समलैंगिकों तथा किन्नरों के आन्दोलन और गरीबी, भ्रष्टाचार तथा महँगाई का इंससे क्या सम्बन्ध है? मै कहता हूँ यही तो हमारे शोध का विषय है। यदि समलैंगिकों तथा किन्नरों को संसद, न्यायपालिका और पुलिस विभाग में शत प्रतिशत आरक्षण दे दिया जाय तो न केवल भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल जाएगी बल्कि सदियों से उपेक्षित इस अल्पसंख्यक समुदाय के सम्वैधानिक अधिकारों की रक्षा भी होगी। साथ ही ढेर सारी समस्याओं का एक ही साथ समाधान हो जाएगा। समलैंगिकों का कोई परिवार नहीं होता। बस वह और दूसरा साथी। परिवार तो उनके साथ रहने का साहस जुटा ही नहीं पाता, इसलिए उनसे रिश्ता ही तोड़ लेता है। बच्चे पैदा होने और उनके पालन पोषण ,शिक्षा-दीक्षा, शादी व्याह के खर्चों की दूर- दूर तक कोई सम्भावना नहीं रहती है। दूर दूर तक रिश्तेदारी में भी कोई अपने बच्चे को इनके साथ रहने की अनुमति देना खतरे से खाली नहीं समझता। इस महँगाई और आर्थिक मन्दी के दौर में ईमानदार आदमी किसी तरह से रोटी-दाल और बाल बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में जीवन भर तबाह रहता है और उसके आदर्शों तथा ईमानदारी को समाज के विकसित लोग मूर्खता का पर्याय समझ कर उसका मज़ाक उड़ाते हैं। ऐसे में जब इन सरकारी विभागों में समलैंगिकों को आरक्षण दिया जाएगा तो निश्चित रूप से भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकेगा। क्योंकि उनके पास न तो असीमित परिवार होंगे और न उन पर खर्च। ऐसी स्थिति में सरकार की ओर से दिया जाने वाला वेतन बड़ी कठिनाई से खर्च हो सकेगा। जिसका परिणाम यह होगा कि पग–पग पर चौराहों पर तैनात ट्रैफिक पुलिस बस, मोटरसायकिल और ट्र्क वालों को रोक रोक कर उनसे वसूली करती नज़र नहीं आएगी। तब थानों पर तैनात पुलिस अपेक्षित धाराओं में अपेक्षित व्यक्ति के विरुद्ध अपराध को अंकित करने के लिए सौदेबाज़ी करती नज़र नहीं आएगी। न्यायालयों मे ऐसे दृश्य नहीं दिखेंगे जब कुर्सी पर बैठा न्यायाधीश अपनी गर्दन नीचे कर अपनी अनभिज्ञता का दिखावा करने लगता है और पेशकार हर मुकदमे में तारीख की रिश्वत आधिकारिक रूप से लेता रहता है, जिनको कि अन्याय से लड़ने के लिए ही सरकारी पद पर आधिकारिक रूप से बिठाया गया है। तब राजनेता अपनी सात पुश्तों तक को सुखी बनाए रखने के लिए लोक कल्याणकारी योजनाओं में लगने वाले धन का घपला नहीं किया करेगा। सरकारी सेवकों और लोकसेवकों को जिनके परिवार के खर्च उनकी आय से ज्यादा हो जाया करते हैं और उन्हें असुरक्षा की भावना सताती है, परिणाम-स्वरूप उन्हें आय से अधिक सम्पत्ति अर्जित करने का जुगाड़ करना पड़ता है और जन कल्याणकारी योजनाओं में लगने वाले धन में हेराफेरी करनी पड़ती है, उन्हें ऐसा करने को बाध्य नहीं होना पड़ेगा। तब हर महीने उन्हें कच्छप गति से चलती हुई वेतनवृद्धि और खरगोशी चाल से चलती महँगाई में तालमेल बिठाते हुए भ्रष्ट होने के लिए मज़बूर नहीं होना पड़ेगा।
हर मर्ज़ का एक ही इलाज़- न रहेगा बाँस और न बाजेगी बाँसुरी। सारे सरकारी विभागों में शत-प्रतिशत आरक्षण समलैंगिकों और किन्नरों का। ऐसा करने में कुछ साल लगेंगे जब सारे परिवारविहीन लोग होंगे सरकारी संस्थाओं में तब दूर-दूर तक भ्रष्टाचार का नामोनिशान नहीं होगा। पुलिस, न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका कानून के अनुसार चलने प्रारम्भ हो जाएंगे और पूरे देश में समरसता आ जाएगी, जिसे लाने का झाँसा अब तक समाजवादी और कम्युनिस्ट देते रहे हैं और तब वह सपना पूरा हो सकेगा जिसे आज़ादी के परवानों ने अपने खून से सींचा था।
अभी कुछ साल पहले की बात है जब उत्तर प्रदेश में गोरखपुर की जनता ने एक शोध किया था। मेयर पद पर एक किन्नर को बिठा दिया गया था। तब यह अनुभव किया गया कि ऐसे लोग जिनका परिवार नहीं होता रिश्वतखोरी और कमीशनखोरी के चक्रव्यूह में फँसे बिना समाज की सेवा करते हुए देश को विकास की दिशा में आगे ले जा सकते हैं। तभी से मैने यह सोंचना प्रारम्भ कर दिया कि अगर भारत से भ्रष्टाचार रूपी कोढ़ का उपचार करना है तो एक ही तरीका है, सभी सरकारी विभागों में शत प्रतिशत आरक्षण समलैंगिकों और किन्नरों के लिए। वैसे तो यह कार्यक्रम लम्बा खिंच सकता है, लेकिन प्रयोग के तौर पर सरकारी विभागों के प्रमुखों और प्रभारी के पदों पर ऐसे अल्पसंख्यकों की नियुक्तियाँ कर शुरुआत तो की ही जा सकती है

-विनय ओझा