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Sunday, November 8, 2009

“समलैंगिकों और किन्नरों को सरकारी पदों पर शत प्रतिशत आरक्षण”



मैं सोच रहा हूं कि केन्द्र सरकार को एक पत्र लिखूं और कुछ सुझाव दूँ ताकि अरसों से अपनी गरिमा और अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष करते आ रहे लोगों (समलैंगिकों तथा किन्नरों) के आन्दोलन में सहभागिता का गौरव अर्जित कर सकूँ। इससे देश की ढेर सारी सामाजिक और राजनैतिक समस्याओं जैसे दहेज, भ्रष्टाचार, महंगाई आदि को कुछ ही सालों में जड़ से खत्म किया जा सकेगा। जबकि अब तक की लगभग सभी सरकारें इन्हें खत्म करने का दावा तो करती रही हैं किंतु इन्हें असाध्य रोग मान कर एड्स की तरह औपचारिक रूप से इलाज करती रही हैं और यह सोच कर कि जनता की गरीबी तो मिटा नहीं सकते, चलो अपनी ही मिटा लें। आज़ादी के बाद से सभी सरकारों और राजनेताओं ने, चाहे वे किसी भी दल के हों, इसी तरीके से जनसेवा की है और ऐसे ही करते जाने की आशा है।

अरे आप को आश्चर्य हो रहा होगा कि समलैंगिकों तथा किन्नरों के आन्दोलन और गरीबी, भ्रष्टाचार तथा महँगाई का इंससे क्या सम्बन्ध है? मै कहता हूँ यही तो हमारे शोध का विषय है। यदि समलैंगिकों तथा किन्नरों को संसद, न्यायपालिका और पुलिस विभाग में शत प्रतिशत आरक्षण दे दिया जाय तो न केवल भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल जाएगी बल्कि सदियों से उपेक्षित इस अल्पसंख्यक समुदाय के सम्वैधानिक अधिकारों की रक्षा भी होगी। साथ ही ढेर सारी समस्याओं का एक ही साथ समाधान हो जाएगा। समलैंगिकों का कोई परिवार नहीं होता। बस वह और दूसरा साथी। परिवार तो उनके साथ रहने का साहस जुटा ही नहीं पाता, इसलिए उनसे रिश्ता ही तोड़ लेता है। बच्चे पैदा होने और उनके पालन पोषण ,शिक्षा-दीक्षा, शादी व्याह के खर्चों की दूर- दूर तक कोई सम्भावना नहीं रहती है। दूर दूर तक रिश्तेदारी में भी कोई अपने बच्चे को इनके साथ रहने की अनुमति देना खतरे से खाली नहीं समझता। इस महँगाई और आर्थिक मन्दी के दौर में ईमानदार आदमी किसी तरह से रोटी-दाल और बाल बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में जीवन भर तबाह रहता है और उसके आदर्शों तथा ईमानदारी को समाज के विकसित लोग मूर्खता का पर्याय समझ कर उसका मज़ाक उड़ाते हैं। ऐसे में जब इन सरकारी विभागों में समलैंगिकों को आरक्षण दिया जाएगा तो निश्चित रूप से भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकेगा। क्योंकि उनके पास न तो असीमित परिवार होंगे और न उन पर खर्च। ऐसी स्थिति में सरकार की ओर से दिया जाने वाला वेतन बड़ी कठिनाई से खर्च हो सकेगा। जिसका परिणाम यह होगा कि पग–पग पर चौराहों पर तैनात ट्रैफिक पुलिस बस, मोटरसायकिल और ट्र्क वालों को रोक रोक कर उनसे वसूली करती नज़र नहीं आएगी। तब थानों पर तैनात पुलिस अपेक्षित धाराओं में अपेक्षित व्यक्ति के विरुद्ध अपराध को अंकित करने के लिए सौदेबाज़ी करती नज़र नहीं आएगी। न्यायालयों मे ऐसे दृश्य नहीं दिखेंगे जब कुर्सी पर बैठा न्यायाधीश अपनी गर्दन नीचे कर अपनी अनभिज्ञता का दिखावा करने लगता है और पेशकार हर मुकदमे में तारीख की रिश्वत आधिकारिक रूप से लेता रहता है, जिनको कि अन्याय से लड़ने के लिए ही सरकारी पद पर आधिकारिक रूप से बिठाया गया है। तब राजनेता अपनी सात पुश्तों तक को सुखी बनाए रखने के लिए लोक कल्याणकारी योजनाओं में लगने वाले धन का घपला नहीं किया करेगा। सरकारी सेवकों और लोकसेवकों को जिनके परिवार के खर्च उनकी आय से ज्यादा हो जाया करते हैं और उन्हें असुरक्षा की भावना सताती है, परिणाम-स्वरूप उन्हें आय से अधिक सम्पत्ति अर्जित करने का जुगाड़ करना पड़ता है और जन कल्याणकारी योजनाओं में लगने वाले धन में हेराफेरी करनी पड़ती है, उन्हें ऐसा करने को बाध्य नहीं होना पड़ेगा। तब हर महीने उन्हें कच्छप गति से चलती हुई वेतनवृद्धि और खरगोशी चाल से चलती महँगाई में तालमेल बिठाते हुए भ्रष्ट होने के लिए मज़बूर नहीं होना पड़ेगा।
हर मर्ज़ का एक ही इलाज़- न रहेगा बाँस और न बाजेगी बाँसुरी। सारे सरकारी विभागों में शत-प्रतिशत आरक्षण समलैंगिकों और किन्नरों का। ऐसा करने में कुछ साल लगेंगे जब सारे परिवारविहीन लोग होंगे सरकारी संस्थाओं में तब दूर-दूर तक भ्रष्टाचार का नामोनिशान नहीं होगा। पुलिस, न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका कानून के अनुसार चलने प्रारम्भ हो जाएंगे और पूरे देश में समरसता आ जाएगी, जिसे लाने का झाँसा अब तक समाजवादी और कम्युनिस्ट देते रहे हैं और तब वह सपना पूरा हो सकेगा जिसे आज़ादी के परवानों ने अपने खून से सींचा था।
अभी कुछ साल पहले की बात है जब उत्तर प्रदेश में गोरखपुर की जनता ने एक शोध किया था। मेयर पद पर एक किन्नर को बिठा दिया गया था। तब यह अनुभव किया गया कि ऐसे लोग जिनका परिवार नहीं होता रिश्वतखोरी और कमीशनखोरी के चक्रव्यूह में फँसे बिना समाज की सेवा करते हुए देश को विकास की दिशा में आगे ले जा सकते हैं। तभी से मैने यह सोंचना प्रारम्भ कर दिया कि अगर भारत से भ्रष्टाचार रूपी कोढ़ का उपचार करना है तो एक ही तरीका है, सभी सरकारी विभागों में शत प्रतिशत आरक्षण समलैंगिकों और किन्नरों के लिए। वैसे तो यह कार्यक्रम लम्बा खिंच सकता है, लेकिन प्रयोग के तौर पर सरकारी विभागों के प्रमुखों और प्रभारी के पदों पर ऐसे अल्पसंख्यकों की नियुक्तियाँ कर शुरुआत तो की ही जा सकती है

-विनय ओझा














Monday, August 24, 2009

धन्य धन्य यह लोक तंत्र

धन्य धन्य यह लोक तंत्र-
भारत का लोक तंत्र दुनिया का बड़ा लोक तंत्र है। केवल भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं, सैद्धांतिक दृष्टि से भी। यहाँ का लोक तंत्र कुछ मूल भूत सिद्धान्तों पर चलता है। पहला यह कि यहाँ जन प्रतिनिधि बनने के लिए यदि कोई योग्यता निर्धारित है तो यह कि वह व्यक्ति पागल या दिवालिया न हो। ऐसे में एक दुर्घटना हो सकती है कि कोई व्यक्ति चुनाव के समय ठीक ठाक हो और चुन कर संसद में पहुँच जाए,यहाँ तक तो गनीमत है, किंतु यदि उसके बाद पागल हो जाये, तो है कोई माई का लाल जो उसे अयोग्य सिद्ध कर दे।
दूसरी बात यह कि भारतीय राजनीति में कुछ तथ्य स्वयंसिद्ध होते हैं,उन्हें किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। जैसे राज-नेताओं की सम्विधान के प्रति निष्ठा स्वयंसिद्ध होती है,जनता के प्रति उनकी निष्ठा भी स्वतः सिद्ध होती है। चाहे बाढ़-राहत कोष का पैसा हो,चाहे पशुओं के चारे का पैसा हो,चाहे भूकम्प-राहत कोष का पैसा हो, सारा पैसा जनता की सेवा के लिए ही होता है, जिस पर जनता से पहले जन सेवियों का पहला अधिकार होता है; या यह कहें कि इस देश के सारे संसाधनों पर जनता से पहले जन सेवियों का प्राथमिक अधिकार होता है। जैसे किसी सरकारी अस्पताल में आम आदमी जो स्वस्थ है, चाहे लम्बी कतार में लग कर अस्वस्थ हो जाए, न केवल दिन भर की रोज़ी रोटी गवाँ देता है फिर भी वांछित दवा नहीं पा सकता, वहीं किसी मंत्री या राज नेता को उपचार करने के लिए दस-पाँच डाक्टरों की टीम बन जाती है और वह सारी सुविधायें सुलभ हो जाती हैं जिन तक आम आदमी की पहुँच मुश्किल होती है । जैसे जब भी किसी आतंकी हमले की आशंका होती है, तो सबसे पहले राज नेताओं की सुरक्षा बढ़ाई जाती है, क्योंकि सुरक्षा बलों पर पहला अधिकार नेताओं का होता है।
जब कभी किसी मंत्री जी का कफिला किसी रास्ते से जाने वाला होता है तो चरो तरफ से उसकी नाकेबन्दी इस तरह से कर दी जाती है कि आम आदमी का आना जाना ही दूभर हो जाता है । कभी कभी तो ऐसा होता है कि हम मयूर विहार से निकले हैं इन्डिया गेट की ओर और प्रगति मैदान से ही राज घाट की ओर मोड़ दिया जाता है, क्या कि मंत्री जी का काफिला आ रहा है । ऐसे में क्या किया जाये कोई चारा नहीं, क्यों कि मंत्री जी आने वाले हैं और राज मार्ग पर उनका पहला अधिकार है, जनता का बाद में ।
दूसरी बात यह है कि भारतीय लोक तंत्र में कमीशन खोरी को भ्रष्टाचार नहीं माना जाता है, बल्कि भ्रष्टाचार और राजनीति का चोली दामन का साथ माना जाता है। जैसे पुष्प का सुगंध से, चाँद का गगन से दीपक का अगन से जो अटूट रिश्ता होता है उसी प्रकार राजनेता का कमीशन से अटूट रिश्ता होता है । उसके बिना वह निष्प्राण होता है । राजीव जी के समय की बात है कि कुछ सिरफिरे लोगों ने जो उस समय विपक्ष में थे अचानक सदन में शोर मचाना शुरू कर दिया कि भारतीय सेना के लिए बोफोर्स की खरीद में रिश्वत खोरी की गई है जो भ्रष्टाचार है और भ्रष्टाचारियों को लोक तंत्र के सरकार में बने रहने का कोई अधिकार नहीं है । असल में यह मामला भ्रष्टाचार का नहीं दृष्टि दोष का है। विपक्ष में बैठे नेता को जो भ्रष्टाचार दिखाई देता है, वही सत्ता में बैठे नेता को कमीशन दिखाई देता है और इसके उलट, जब वह सरकार में होता है तो उसे भी भ्रष्टाचार नहीं दिखाई देता । इसी दैवी प्रेरणा से संचालित होकर कंग्रेस ने सम्विधान में लाभ के पद की परिभाषा को दुरुस्त कर दिया, जो बाबा अम्बेडकर की ऐतिहासिक भूल का परिणाम थी। अब ऐसा कोई अवसर नहीं आएगा जब सरकार में लाभ के पद पर बैठे राज नेता को संसद की सदस्यता से हाथ धोना पड़ जाये । दर असल इस सम्वैधानिक भूल सुधार में सभी राज नेताओं के उर्वर मस्तिष्क का योगदान है जो भारतीय लोक तंत्र के नेताओं का मैग्ना कार्टा कहा जा सकता है, जिससे उंनको भ्रष्टाचार के पैदाइशी राज मार्ग पर अबाध रूप से आगे बढ़ते रहने का सार्वभौमिक अधिकार प्राप्त हो गया है। अरे मैं तो भटक गया था, चर्चा कर रहा था बोफोर्स के मुकद्मे की। जन सेवकों पर रिश्वत खोरी का मुकद्मा चलाया गया, जो बीसों साल तक चला। परिणाम फिर वही ढाक के तीन पात। दस बार उच्च न्यायालय और पाँच बार उच्च्तम न्यायालय का चक्कर लगाने के बाद भ्रष्टाचार के रिश्वत की रकम कमीशन में बदल गयी और यह साबित हुआ कि कमीशन और रिश्वत्खोरी में फर्क होता है। यह व्यापार का नियम है कि विकसित देशों में बिना किसी कमीशन के भुगतान के कोई सौदा नहीं होता,तो भारत जैसे देश में तोप की सौदेबाज़ी में खाए गए कमीशन को रिश्वत खोरी से संग्यापित करना कानून की गलत व्याख्या करना होगा अतःआरोपियओं को बरी किया जाना चाहिए ।

जब मैं अपनी आय की तुलना राज नेताओं की आय से करता हूं तो लगता है कि कि बाढ़ और सुनामी का मुकाबला करने की कोशिश कर रहा हूँ । जो व्यक्ति सड़क-छाप हो, अगर उसे किसी दैवी कृपा से सदन तक पहुँचने का अवसर मिल जाय और उसके भीतर राजनैतिक वाइरस मौजूद हों तो मैं यह गारंटी से कह सकता हूँ कि वह पाँच साल में इतना कमा लेगा जितना उद्योगपति उतने समय में उतना नहीं कमा सकता है। आज जहाँ छोटे सरकारी पदों पर बैठे लोगों को भी आय कर देना पड. रहा है,जिसका कि मुश्किल से दाल रोटी का जुगाड़ हो पाता है। वहीं नेताओं पर और उनसे साठ गाठँ किए जमा खोरों पर आय कर विभाग की नज़र भी नहीं जाती बल्कि वह सुन्दर-सुन्दर अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के घरों पर छापे मार कर कोटा पूरा करता है।किंतु राज नेताओं के पास करोड़ों-अरबों की सम्पत्ति की ओर उसका ध्यान ही नहीं जाता । संसद में विश्वास मत के दौरान करोडों रुपये रिश्वत के रूप में लेने का आरोप लगा और टी वी चैनलों पर दिखाया भी गया, जिसकी जाँच के लिए संसदीय समितियाँ भी बनीं, लेकिन महीनों की औपचारिक माथा पच्ची करने के बाद यह भी पता नहीं लगा पाईं कि किस खाते से पैसा निकला, कहाँ से चला और किस उद्देश्य से कहाँ पहुंचा । मेरा ख्याल है कि अगर लीपापोती ही करनी थी तो उसे यह रिपोर्ट दे देना था कि संसद में दिखाया गया रिश्वत का रूपया नकली था, इस लिए किसी तरह की जाँच की जरूरत ही नहीं है, क्योंकि भ्रष्टाचार का मुकद्मा बनने के लिए नोटों का असली होना चाहिए, नकली नोटें लेना भ्रष्टाचार की परिभाषा में नहीं आता । इस लिए किसी जाँच का सवाल ही नहीं उठता।

महात्मा गान्धी जी ने कांग्रेस को नारा दिया था “जीयो और जीने दो”, जिसे सभी दलों ने संशोधित रूप में सर्व सम्मति से अपना लिया है वह यह कि “खाओ और खाने दो”। सत्ता पक्ष खाता है और उसी तरह खाता है, जैसे कि सब्ज़ी मंडी में आवारा साँड़ दुकानदारों के हट-हट करने और लगातार डंडा बरसाने के बावज़ूद भी दो गाल खा ही लेता है । सदन में विपक्ष हल्ला करता रहता है, जाँच समितियाँ बनती रहती हैं, वे या तो लीपा पोती कर रिपोर्ट दे देती हैं या तो उसे ठंडे बस्ते में डाल देती हैं। जो रिपोर्ट दे दी, सो अंतिम सत्य, जिसे सरकारी तंत्र की गोपनीयता के चादर में लपेट कर दफन कर दिया जाता है और जिसे सूचना के अधिकार की गेती से भी खोद कर नहीं निकाला जा सकता है। जब विप्क्ष का पाला पाँच साल बाद बदल जाता है और वह सत्तासीन होता है तो वह भी उसी नीति पर चलता है। जैसा कि राजीव गान्धी जी ने स्वीकार किया था कि जो पैसा पंचायतों में भेजा जाता है वह पहुँचते पहुँचते 100 पैसे से 15 पैसा शेष रह जाता है, और 85 पैसा रास्ते मे ही पता नहीं क्या हो जाता है। ऐसी बात नहीं कि उन्हें पता नहीं था कि 85 पैसा कहाँ जाता है? देश के बैंकों में जाता है या स्विश बैंकों में जाता है। इस लोक तंत्र में खाओ और खाने दो का सिद्धांत सर्व व्यापक है और सर्व मान्य भी। इसे चुनौती देना चीनी साड़ को लाल कपड़ा दिखाने जैसा है ,जैसे नेशनल हाइवे अथॉरिटी के इंजीनियर सत्येन्दर दुबे हत्या कांड, पी डबल्यू डी के उस इंजीनियर का हत्याकांड, जिसने मायावती जी के जन्म दिन मनाने के लिए वसूली जाने वाली रकम देने से इंकार कर दिया था। ऐसी सूचियाँ लम्बी हैं और समय सीमित ।
विश्व के सारे सभ्य कानून यह मानते हैं कि आपराधिक दुराशय के बिना किया हुआ कोई भी कार्य अपराध की परिभाषा की परिधि में नहीं आता। किंतु दिल्ली पुलिस ने किस दैवी प्रेरणा से कोबरा पोस्ट.कॉम के पत्रकार अनिरुद्ध बहल और सुहासिनी राज को भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के आरोप में चार्ज शीट किया, जिन्होंने संसदीय भ्रष्टाचार का खुलासा किया जिसमें संसद में प्र्श्न पूँछने के लिए संसदों को पत्रकारों से रिश्वत लेते स्टिंग ऑपरेशन का वीडियो दिखाया गया था। जब कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भ्रष्टाचार को बेनकाब करने के लिए पत्रकारों द्वारा स्टिंग ऑप्रेशन को सराहनीय बताया गया था, जिसकी वजह से बी एम डबल्यू कांड में वकील और सरकारी वकील की मिली भगत से गवाह को फोड़ते दिखाया गया था। ऐसे में जब स्टिंग ऑपरेशन करने वाले पत्रकारों को लोक तंत्र का प्रहरी कह कर उच्चतम न्यायालय द्वारा सराहा जा रहा है, वहीं पुलिस से साठ गाँठ कर उन्हें आरोपित कर किस कानून की रक्षा की जा रही है मेरे समझ में नहीं आ रहा है। तभी तो यह बात निकलती है मुख से ‘धन्य धन्य यह लोक तंत्र ’ । -विनय कुमार ओझा