Monday, January 7, 2008

ग़ज़ल

अब सुनाई ही नहीं देती है जनता की पुकार।
इस तरह छाया हुआ है उनपे गद्दी का खुमार ॥

अब दुकानों से उधारी दूर की एक बात है-
जब बगल वाले नहीं देते हैं अब हमको उधार ॥

लाँघ पाना या गिरा पाना जिसे मुमकिन नहीं -
हर दिलों के दरमियाँ नफरत की है ऊँची दिवार॥

सैकड़ों बगुलों ने मिल घेरा है एक दो हंसों को-
लगता नामुमकिन है लाना अब सियासत में सुधार॥

खुद की कुर्बानी का जज्बा गुम गया जाने कहाँ-
इस शहर में हर कोई है लूटने को अब तयार॥


-विनय ओझा 'स्नेहिल '

Monday, December 10, 2007

वक्त भर देता है ...

वक़्त भर देता है हर एक ज़ख्म की गहराईयाँ ।
फिर भी रह जाती हैं क्यों ये मातमी परछाइयाँ ॥

या खुदा एक पल में दिखता दो तरह ज़लवा तेरा-
एक तरफ मातम का डेरा एक तरफ शहनाइयाँ ॥

स्याह रातों से न जाने दिल क्यों घबराने लगा-
साँप सी डसती हैं मुझको शाम की तन्हाइयाँ ॥

दफन अश्कों ने किया ग़म के कई तूफान को -
दर्द भरती हैं नसों में मद भरी पुर्वाईयाँ ॥

जो सबेरे उठ गए मीलों सफर से आ चुके-
रह गए बिस्तर पे जो लेते रहे अन्गडाइयां॥

जिनको चुन कर भेजा अपनी रहनुमाई के लिए -
बैठ कर सदनों में वे लेते हैं अब जम्हाइयां ॥

विनय ओझा 'स्नेहिल'

Thursday, November 22, 2007

ठोकरें राहों में मेरी कम नहीं।
भी देखो आँख मेरी नम नहीं।

जख्म वो क्या जख्म जिसका हो इलाज-
जख्म वो जिसका कोई मरहम नहीं।

भाप बन उड़ जाऊंगा तू ये न सोच-
मैं तो शोला हूँ कोई शबनम नहीं।

गम से क्यों कर है परीशाँ इस क़दर -
कौन सा दिल है कि जिसमें ग़म नहीं।

चंद लम्हों में सँवर जाए जो दुनिया -
ये तेरी जुल्फों का पेंचो-ख़म नहीं।

दाद के काबिल है स्नेहिल की गज़ल-
कौन सा मिसरा है जिसमें दम नहीं।

-विनय ओझा ' स्नेहिल'

Friday, November 2, 2007

जिंदगी

ज़िन्दगी क्यों उदास लगती है ।
मौत जब आस- पास लगती है ॥

मुझसे वह बिन मिले नहीं जाता -
कुछ तो दिल में खटास लगती है॥

कितने अर्सों से देखता हूँ उसे -
फिर भी हर लम्हा ख़ास लगती है॥

जितनी कोशिश करो बुझाने की -
उतनी ही ज्यादा प्यास लगती है॥

मर के भी आंख थी खुली उसकी -
उनको मेरी तलाश लगती है ॥

- विनय ओझा "स्नेहिल "

Friday, October 26, 2007

कता

उम्मीद की किरण लिए अंधियारे में भी चल।
बिस्तर पे लेट कर ना यूँ करवटें बदल।

सूरज से रौशनी की भीख चाँद सा न मांग,
जुगनू की तरह जगमगा दिए की तरह जल ॥

-विनय ओझा स्नेहिल

Tuesday, October 16, 2007

कता

राह में जब जब अँधेरे हो गए ।
रहनुमा मेरे लुटेरे हो गए ॥

बैठते थे फाखते जिस शाख़ पे -
चील और कौओं के डेरे हो गए।।

विनय ओझा 'स्नेहिल '

Tuesday, October 9, 2007

दीवार की काई की तरह .......

अपनी उम्मीद है दीवार की काई की तरह ।
फिर भी ज़िन्दा है खौफ़नाक सचाई की तरह॥

पेट घुटनों से सटा करके फटी सी चादर -
ओढ़ लेता हूँ सर्दियों में रजाई की तरह ॥

आँधियाँ गम की और अश्कों की उसपर बारिश -
साँस अब चलती है सावन की पुरवाई की तरह ॥

जाने यह कौन सी तहज़ीब का दौर आया है-
बात अब अच्छी भी लगती है बुराई की तरह ॥

सारी जनता तो उपेक्षित है बरातीयों सी -
और नेताओं की खातिर है जमाई की तरह ॥

- विनय ओझा ' स्नेहिल '