Saturday, June 20, 2009
'पड़ गया खतरे में'
देश का बच्चा बच्चा हर इंसान पड़ गया खतरे में ..
चला मुकद्मा सालों तक और दोष सिद्धि तक जा पहुंचा –
पर अफज़ल की फांसी का फरमान पड़ गया खतरे में..
बेशर्मी का आज एक पर्याय बन गयी है खादी -
वीर सुभाश और बिस्मिल का बलिदान पड़ गया खतरे में..
आज लुटेरों और पुलिस में साठ- ग़ांठ कुछ ऐसी है -
आज देश का हर कोई धनवान पड़ गया खतरे में..
पहले तो वह आदेर्शों की खूब दुहाई देता था-
जब रिश्वत की रकम बढ़ी ईमान पड़ गया खतरे में..
बैंक लुटेरा ए के सैंतालिस ज़ब लेकरके पहुंचा -
दोनाली बन्दूक लिए दरवान पड़ गया खतरे में ..
राम नाम को लेकर इतनी राजनीति चमकाई कि -
रामलला मे स्थापित भगवान पड़ गया खतरे में..
नमक बढा आई चुपके से ननद सास की साज़िश में -
बहू विनिर्मित स्वाद भरा पकवान पड़ गया खतरे में॥
Tuesday, June 16, 2009
'कोई तो होगा'
मैं जितना प्यासा हूं उतना प्यासा कोई तो होगा।।
जाने कितने ऐसे हैं जो ज़ाम ज़हर का पीते हैं-
जो मेरे आँसू पी जाए ऐसा कोई तो होगा ॥
देख के तुमको दिल मे मेरे एक कशिश सी उठती है-
तेरे दिल का मेरे दिल से रिश्ता कोई तो होगा ।।
-विनय कुमार ओझा 'स्नेहिल'
Friday, March 27, 2009
लोकतंत्र के कहांर ही कहर बने.
लोकतंत्र के कहाँर ही कहर बने।
देश और समाज के लिए ज़हर बने ॥
आतंक के आरोप में जो दोषसिद्ध हैं-
वो ही समाजवाद के हैं पक्षधर बने ॥
सबको पता है आती है हर साल यहाँ बाढ़ -
किस हाल में नदी के तटों पर हैं घर बने॥
कीचड उछालते हैं वो औरों पे इस लिए -
वे सिर्फ़ चाहते हैं की उन पर ख़बर बने॥
बैठा के सबको खे सकेंगे नाव कहाँ तक-
पग पग पे सियासत के सैकड़ों भंवर बने॥
इन्सान भटक जाए सचाई के राह से -
केवल इसी लिए ही वासना के ज्वर बने ॥
Friday, February 13, 2009
चिराग अपनी उम्मीदों के....
चिराग अपनी उम्मीदों के आस पास रखो ॥
मेरी तस्वीर तुम्हे जाम में दिख जाएगी -
अपने होठों पे मेरे नाम की एक प्यास रखो ॥
हार ख़ुद जीत का बन हार गले आ के पड़े -
बुलंद इतना दिल में जीत का एहसास रखो॥
- विनय ओझा 'स्नेहिल'
Monday, December 29, 2008
सन्जीवनी क्या है ?
Monday, December 22, 2008
आंधियों में दिए हम जलाते रहे
नीद अँधियारों की हम उड़ाते रहे ॥
बस उन्ही को ही मंज़िल मिली दोस्तों -
ठोकरें खाके जो मुस्कराते रहे॥
ये न पूँछो कि कैसे कटी ज़िन्दगी-
अश्क पीते रहे ग़म को खाते रहे॥
गर न पाया कभी काट खाया उन्हें -
दूध साँपों को जो थे पिलाते रहे॥
सोंचिए प्यास उनकी बुझी किस तरह-
उम्र भर जो पिए और पिलाते रहे॥
नोट की गद्दियाँ रख के हाथों में वो-
मेरे ईमान को आजमाते रहे॥
उन दीयों से अंधेरों की होगी सुलह-
जो सदा रौशनी बेंच खाते रहे ॥
दुनिया ने उनको कुछ भी न बनने दिया -
सर हर एक देर पे जो थे झुकाते रहे॥
इस तरह से भी 'स्नेहिल' से क्यों रूठना -
मुडके देखा भी ना हम बुलाते रहे॥
Friday, October 10, 2008
दोहे
शेख जाहिरा देखती कठिन न्याय का खेल।
सच पर जोखिम जान की झूठ कहे तो जेल॥
खल नायक सब हैं खड़े राजनीति में आज।
जननायक किसको चुनें दुविधा भरा समाज।।
क्या हिंदू क्या मुसलमाँ ली दंगो ने जान।
गिद्ध कहे हैं स्वाद में दोनो मॉस समान॥
जिसको चक्की पीसनी थी जाकरके जेल।
आज वही हैं खींचते लोकतंत्र की रेल॥
बाल सुलभ निद्रा और बालसुलभ मुस्कान।
बच्चों के अतिरिक्त दे संतों को भगवान॥
एक गधा घुड़दौड़ में बाजी ले गया मार
बेचारा घोड़ा हुआ आरक्षण का शिकार॥
लोकतंत्र की गाय को दुह कर कर दी ठाँठ ।
जनसेवी माखन भखें, जन को दुर्लभ छाँछ॥
- विनय ओझा स्नेहिल
